Saturday, 18 April 2015

पुराने पल..

कभी कभी मुझे वो ख़ास लम्हें बहुत ज्यादा याद आते है जिन्हे मैंने किसी विशेष व्यक्तियों के साथ ज़ाया किया था.उनकी बातें,उनके अंदाज़ और तौर तरीके जिस पर हम घंटों अपनी दलीलों के पेंच लड़ाते रहते थे.उनकी ख़ुशी और उनकी हर एक छोटी छोटी खुशियों का हिसाब रखते थे.क्युकी वो आज मेरे सफर में मेरे साथ नहीं है तो इस बात का एक हद तक अफ़सोस है पर  इस बात का थोड़ा गुरुर भी है कि शायद मुकद्दर को यही पसंद था जिसने मुझे इस काबिल बनाया कि मैं उन्हें आगे भी इसी तरह मुस्कुराते हुए झेल सकूँ.मुझे दुःख इस बात का कदापि नहीं है कि वो चले गए अपितु इस बात का होता है कि शायद वो अगर आज मेरी सफर में मेरे साथ होते तो ज़िन्दगी जीने का मज़ा कुछ और ही होता.खैर अब ज़िन्दगी तो हमारे हिसाब से नहीं चलने वाली बल्कि हमे ही उसके हिसाब से चलना पड़ेगा इस उम्मीद के साथ कि जो होता है वो किसी न किसी कारण से होता है और अच्छा ही होता है. 

Saturday, 28 February 2015

दोस्ती:एक एटीएम (ऐनी टाइम मदद )

ऐसा क्यों होता है की हम लोगों की अच्छाइयों को छोड़ उनके बुराइयों पर ज्यादा गौर कर बैठते है जब हमारी बारी आती है उनके लिए कुछ करने की.हम अगर किसी की निस्वार्थ भाव से मदद करें और कभी कभार किसी कारण के वजह से उसकी मदद न कर पाये तो उसे सिर्फ वही बात क्यों याद रह जाती है उसे वो तो बिलकुल याद नहीं रहता की हमने पहले भी उसकी मदद की है वो भी बिना किसी शर्त के बिना किसी लाभ के.हमने ही हर बार उसकी मदद करने की जिम्मेदारी थोड़ी न ले रखी है.जब उसके बारी आती है हमारी मदद की तो वो वही बात बोलकर निकल जाता है की " याद है तुमने उस दिन मेरी मदद नहीं की थी तो मैं क्यों करू " जैसे की वह बस उस मौके की तलाश में है की कब हम उनसे वैसा ही मदद मांगे.
कितनी चालू है ये दुनिया जो हमसे अपने काम बड़ी चालाकी से निकलवा लेती है या फिर हम बेवक़ूफ़ है जो बेवज़ह दुसरो की मदद के लिए अपना अमूल्य वक़्त ज़ाया करते फिरते है.मैं मानता हूँ कि किसी और से उम्मीद रखना खुद में अच्छी बात नहीं पर फिर भी कभी न कभी किसी मोड़ पर हमें दूसरों की,अपने दोस्तों की,जरूरत पद ही जाती हैं.
कुछ दोस्त तो ऐसे भी बन गए है जो सिर्फ काम पड़ने पर ही फ़ोन किया करते है. क्या आज का ज़माना वो ज़माना नहीं रह गया जहाँ लोग दूसरों की सलामती और हाल चाल जानने के लिए भी फ़ोन किया करें,लोगों को मतलब है तो बस अपने काम से. काम निकल गया तो कोई शुक्रिया तक नहीं कहता.और अगर कोई ये कहे की उसके पास समय नहीं था किसी को फ़ोन करने का तो आप उस व्यक्ति के संचालन का अंदाजा लगा सकते है,ये सोच सकते है की वो कैसे मैनेज करता होगा अपनी ज़िंदगी.
कुछ ऐसे भी दोस्त है जो ये बात गर्व से कहते है की हमारे तरफ तो लोग काम होने की वज़ह से दूसरों को फ़ोन करते है.दुःख की बात तो ये है की हम इतने शिक्षित होने के बावजूद इन ख्यालों पर आँख मूँद कर विश्वास कर लेते है.डिग्रियाँ तो बस कागजो पर ली जाती है काश कोई लोगों के चरित्र की भी डिग्रियां बांट देता तो कितना अच्छा होता.कम से कम ये तो पता चल जाता की किससे दोस्ती करनी है और किससे नहीं.
खैर मैंने तो इस श्रेणी में आने वालों दोस्तों से परहेज़ करना शुरू कर दिया और आपसे भी निवेदन है कि आप भी करें क्युकी जब आप उनके ऐसे कठोर और निर्दयी टिपण्णियां सुंनेंगे तो कही न कही आपको भी दर्द जरूर होगा

Tuesday, 17 February 2015

स्प्रिंग फेस्ट'15

कॉलेज में बाहर के दोस्तों के साथ वक़्त बिताने का मौका बार बार नहीं मिलता.पर इस बार मुझे भी ऐसे ही कुछ मौका मिल गया था.मैं शुरू से सोचता था कि स्प्रिंग फेस्ट में होता क्या है लड़कियों को ताड़ने के अलावा पर ताड़ने का मज़ा और भी बढ़ जाता है जब आपके साथ आपके दोस्त हो.मेरे साथ भी इस बार ऐसा ही कुछ हुआ.बहार से मेरे कुछ दोस्त आये हुए थे.वो तो मेरे कमरे में ही ठहर रहे थे पर मुशीबत तब आई जब मुझे पता चला कि दोस्तों में एक अनजान लड़की भी है जिसके मैंने पहले काफी चर्चे तो सुने थे पर मिला नहीं था.बड़ी मुस्श्कत के बाद मैंने किसी तरह उसके यहाँ रुकने का इंतज़ाम करवाया.धन्यवाद हो प्रियंका का जिसने सही वक़्त पर मेरी मदद कर दी और मेरी लाज बचायी.वैसे उन्होंने सोचा तो बिलकुल भी नहीं होगा कि मैं साइकिल से मिलने पहुँचूँगा पर फिर भी अगर उन्हें थोड़ा अजीब लगा भी हो तो लगने दिया जाए आखिर कार वो खड़गपुर जो आये थे.
हमलोगों ने इंडियन ओसियन बैंड के कुछ गाने सुने और बीच में ही निकल गए.खाना खाने के बाद थोड़ा घूम ही रहे थे कि क्रिकेट वालों की मीटिंग का कॉल आ गया है.मीटिंग के बाद मैं उनसे फिर से मिला और कुछ बात चीत के बाद मैंने उन्हें आराम देने का फैसला लिया.रात को बातें करते करते कब २:३० बज गए पता ही नहीं चला.
अगले दिन पांच परमेश्वर के लिए सुबह ही निकलना था तो मैंने सरस्वती पूजा का प्रशाद खा कर निकलना उचित समझा.सारा दिन एरीना में पसीना बहाने के बाद जब शाम में फ़्लवोर्स में डांस किया तब जाकर दिन कि सारी थकान मिटी और वापस आ कर फिर से उन्हीं दोस्तों के साथ सुबह के ३ बजे तक बीच सड़क पर उनके साथ घूमना,गप्पे और हसी मज़ाक सब कुछ कीमती लग रहा था मेरे लिए.रजत कि तो मारते मारते मैं खुद भी थक गया था.बेचारा !! जब वो चले गए तो पता नहीं स्प्रिंग फेस्ट का अगला दिन काफी खली खली लग रहा था ऐसा मानो उस दिन साधारण क्लासेज चल रही हो.फिर बाद में मैं खुदको बहुत कोश रहा था कि मुझे उनको और वक़्त देना चाहिए था.शायद मैं समय का संतुलन बनाने में असफल हो गया था.पर जो भी हुआ अच्छा ही हुआ.आशा करता हूँ की वो दुबारा यहाँ आये .उस एक दिन में मैंने काफी लम्बी ज़िन्दगी जी.उस दिन तो वो एक दिन भी छोटा पड़ गया था.उम्मीद करता हूँ ज़िन्दगी आगे भी ऐसे हसीं और यादगार लम्हों से मुलाकात कराने की ज़ुर्रत करते रहेगी.

Friday, 9 January 2015

सपनों का शहर...मुंबई !

लोग कहते हैं की मुंबई सपनों का शहर है.यहाँ लोग अनेकों सपने लेकर आते हैं.कोई बॉलीवुड में अपनी किस्मत आज़माने आता है तो कोई अपने बच्चों का पेट पलने की उम्मीद लगाये,कोई अपना भविष्य सवारने आता है तो कोई पापा के कारोबार को आगे बढ़ने.सबके अपने अपने सपने होते हैं जिसे वो अपने तरीके से पूरा करना चाहते है.कुछ लोग सफल होते है तो कुछ नहीं और कुछ तो सपनों की इस मायानगरी के दिखावे का शिकार हो जाते हैं.

पर एक और वैसे लोग भी होते हैं जिनके सपनें बस सपनें ही रह जाते हैं.कभी वक़्त साथ नहीं देता तो कभी पैसे और अगर गलती से ये दोनों साथ भी दें जाए तो हालत साथ नहीं देता.कभी कभी तो अचानक वो कारण ही तबाह हो जाते है जिसे पूरा करने की सोच वो मुंबई जाने के सपनें संजोते है.उनके हौसले जिनमें पहले पंख लगे होते है धीरे धीरे उन्हीं पंखो में जंग लग जाती है और उनका सपना बस सपना ही रह जाता है मुंबई जाने का

Saturday, 8 November 2014

ज़िन्दगी रॉक्स ...!!!

ज़िन्दगी का खेल होता है ऐसे
बिन मौसम बरसात हो जैसे
पल भर में ये बदलती है ऐसे
धुप और छाए दिन में हो जैसे

कभी गम के आंसू टपकती है
तो कभी खुशियों की बारिश कर देती है
कभी निराशा की शाम करती है
तो कभी उम्मीदों की किरण बिखेरती है
कभी यारो से लडवा देती है
तो कभी नयी दोस्ती करवा देती है
कभी हम किसी का सहारा बनते है
तो कभी हमारे अपने ही छोर जाते है
कभी चीटियों के जैसे बिजी होते है
तो कभी मरीज के जैसे पड़े होते है
कभी कोई हमारा दिल तोड़ देता है
तो कभी कोई उसमे समां जाता है
कभी ज़िन्दगी रेगिस्तान की बंजर लगती है
तो कभी फूलो जैसे रंगीन हसी लगती है
कभी भगवन से रिश्ता तोडवा देती है
तो कभी उनसे जुड़ने को मजबूर कर देती है
कभी पापा की शान का कारण बनती है
तो कभी माँ के उदासी का राज बना देती है

पर कोई तो ज़िन्दगी के इस खेल में आएगा
मेरा हाथ थमेगा और कभी नहीं छोरेगा
मेरी हर बात सुनेगा मुझे समझेगा
वक़्त आने पर अपनी जान की बजी तक लगा देगा

वो मेरी अच्छाई की तारीफ़ भी करेगा
और बुरइयो पर मेरी वाट तक लगाएगा
कामयाबियो पर मेरी पार्टी भी लेगा
और हार पर जो जीतने को कहेगा

पर ज़िन्दगी को कोई समझ नहीं है पाया
और किस्मत ने मेहनत को हरा कब है पाया
फिर भी ये ज़िन्दगी तो ज़िन्दगी है
और इसे जीना तो हमें ही है ...

Saturday, 1 November 2014

dedicated to Vinay Prasad !! happy birthday yar !!

कुत्ता,कमीना और सनकी है तू
कमरे में न घुसने देता है तू
लाख पाबंदियां लगता है तू
पर फिर भी यारों का यार है तू
आवारा,आलसी और हरामी है तू
किसी का दर्द न समझता है तू
बस लेता और कुछ न देता है तू
पर रह दिखने में आगे है तू
अशिष्ट,अभद्र और स्वार्थी है तू
डेप का असली मग्गू है तू
प्रोफ को नचा देता है तू
पास दोस्तों का भला भी करता है तू
चोर,गुंडा और शिकारी है तू
किसी के प्यार में दीवाना है तू
रातों की नींदे चुराता है तू
दिलों जान भी उसपर छिड़कता है तू

Wednesday, 29 October 2014

उलझन !!

ज़िन्दगी बहुत अजीब है,कब क्या कर दे कुछ मालूम ही नहीं होता.हम किसी की पीछे भागते है और वो किसी और के पीछे.सोचता हूँ की भागना ही बंद कर दूँ.जो मिलना होगा मिल जायेगा पर फिर ज़िन्दगी कुछ ऐसा क्यों करती है जो हममे भागने पर मज़बूर कर देता है.किसी के पास समय नहीं होता तो किसी के पास इरादा.पर हकीकत ये है की अगर हम उन चीज़ों पर अपना ध्यान केंद्रित करें जो हमारे पास है और उन लोगों से तुलना करें जिनके पास कुछ भी नहीं है तो हम खुद तो ज्यादा खुशनसीब पाएंगे.सच में कभी कभी तो समझ में नहीं आता है की करना क्या है.बिलकुल ठंढे पड़ जाते है.मेरे हिसाब से हमे कुछ चीज़ों को वक़्त और ईश्वर पे छोड़ देना चाहिए और आगे बढ़ना चाहिए.मै भी अभी कुछ इसी तरह की परिस्थिति में हूँ मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है की ज़िन्दगी के इस खेल में क्या भूमिका निभाऊ,ज़िन्दगी के इस होली में रंगों से भींग जाऊ या फिर कही जाकर छुप जाऊ या फिर सिर्फ आगे बढू यह मान कर की जो होगा अच्छा ही होगा.वैसे तो मैंने अपने दोस्तों की भी सहायता ली पर सब कुछ व्यर्थ रहा.जैसा की मैंने पहले भी कहा है की ज़िन्दगी एक सागर के सामान है और हम एक नाव की भांति और इस लम्बे सफर में कुछ फैसले हमें ही करने होते है चाहे वो सही हो या गलत,पर फैसले हमें ही लेने होते है.क्या होगा ज्यादा से ज्यादा हम गिर जायेंगे हमें चोट लगेगी,पर मुझे विश्वास है ज़िन्दगी पर अगर ये एक द्वार बंद करेगी तो दूसरा भी ज़रूर खोलेगी.