Thursday, 24 August 2017

अजनबी तुम अजनबी हम !!


अब तो एक ऐसा दौर आ गया है
जब हम एक दूसरे की ओर देखना भी नहीं चाहते
तुम शायद आगे निकल गए हो ज़िन्दगी के दौर में
या शायद मैं पीछे छूट गया हूँ इस सफर में
ऐसे करवा में हो गए..कुछ अजनबी तुम अजनबी हम

तुमसे बातें किये बिना कल तक दिन पूरा नहीं होता था
आज तुमसे बातें करने को बातें नहीं होती
तुम कुछ बताती नहीं और मेरी बातें सुन्ना नहीं चाहती
मुझ से ज्यादा तो तुम अपने दोस्तों का साथ पसंद हो करती
इसी सन्नाटे में होते जा रहे..कुछ अजनबी तुम कुछ अजनबी हम

जानता हूँ मैं की हम दूर थे पर शायद हमारे दिल करीब थे
वक़्त के सैलाब ने लेकिन सब कुछ उथल पुथल कर दिया
मैं खुद को जितना संभल रहा था तुम उतना और गिरते जा रही थी
मैं जितना पास आने की कोशिश कर रहा था तुम उतना दूर जा रही थी
ऐसे ही हालात में हो रहे थे..कुछ अजनबी तुम कुछ अजनबी हम

एक लम्बा अरसा हो गया है तुमसे बात किये हुए
वक़्त मिले तो हमारा ख्याल कर लेना अपने इस व्यस्त सफर में
पता हैं मुझे.. की और लोग भी है तुम्हारे पास इस कतार में
याद करना वो लम्हा जब तुम ही तुम थी मेरी कतार में
इसी भाग दौर में हो रहे..कुछ अजनबी हम कुछ अजनबी तुम



Wednesday, 29 March 2017

जिंदगी जीने की कला !!

क्या होता है जब आपका कोई ख़ास, जिनके लिए आप कुछ भी कर सकते है हर वक़्त आप उपलब्ध रहते है चाहे वो कोई भी वक़्त क्यों न हो, एक नयी ज़िन्दगी जीना शुरू करता है ? शुरू शुरू में उसे कई परेशानियां होती है, जहाँ आप हर बार उसकी मदद करने से नहीं कतराते, धीरे धीरे फिर वो संतुलित हो जाते है उस पर्यावरण में. उसे नयी ज़िन्दगी मिलती है, नए लोग, नयी जगह, नए दोस्त और नए दुश्मन भी. क्या इसमें उनलोगों का कोई हाथ नहीं जिन्होंहे उन्हें वह पहुचने में उनको मदद की? हर कदम पर उनके साथ रहे, उनकी मदद की और उन्हें बढ़ावा भी दिया और बदले में उन्हें क्या मिला ? सिर्फ इंतज़ार !!!

वो नए लोगो के साथ इस कदर मिल जुल जाते है की उन्हें पुरानों की कोई चिंता ही नहीं. मैं ये नहीं कहता हूँ की आप अपनी ज़िन्दगी मत जियो पर उन लोगो को नज़रअंदाज़ मत कर दिया करो जिनका प्यार और स्नेह से आप यहाँ तक पहुँचे है. वैसे लोग बहुत मिलेंगे जो आएंगे, मज़े लेंगे और चले जायेंगे पर वो लोग हमेशा साथ रहेंगे जो आपको तहे दिल से चाहते है, आपकी क़द्र करते है, आपको सदा आगे बढ़ते हुए देखना चाहते है और आपको उसके लिए प्रेरित भी करते है अगर आप उन्हें अगर अपना थोड़ा सा भी वक़्त नहीं दे सकते हो तो यह ज्यादा बेहतर होगा की आप ये कबूल कर लो की आप उनके लायक नहीं है. मेरा व्यक्तिगत ये मानना है की हर इंसान में ये कला होनी चाहिए, अगर नहीं है तो सीखनी चाहिए, की वो सबको मिला कर रखे..नए दोस्तों और लोगो के साथ तो वो दिन का ज्यादातर वक़्त गुज़ार ही देते है पर उन्हें अपने दिन का थोड़ा सा हिस्सा पुराने लोगों के लिए भी रखना चाहिए क्योंकि जिस तरह नए लोग महत्वपूर्ण है वैसे ही पुराने दोस्त भी तो ख़ास है !!

Monday, 6 February 2017

संघर्ष

ईश्वर ने किस तरह से इंसान को बनाया है न. हमे दिल और दिमाग दोनों दिए है. दिल की करामातों की सजा दिमाग को भुगतनी पड़ती है और जो दिमाग करने को कहता है वहाँ दिल ही नहीं लगता है. दिल कहता है हवा में तैरूं तो दिमाग होने वाले शारीरिक दर्द की ख़याल दिलाता है. दिल कहता है की कही निकल चले बिना कुछ सोचे बिना कुछ समझे तो दिल समय और पैसे की तंगी की ओर इशारा करता है. दिल कहता है की किसी से दिल लगा लो तो दिमाग कहता है की अभी अपना मुकाम हासिल कर लो.

मैंने ऐसा पाया है की जिन लोगो का दिमाग उनके दिल पर राज़ करता है वो आगे तो बढ़ जाते है पर वो अकेले होते है उनके साथ खुशिया बाँटने के लिए कम लोग होते है और जो लोग दिल लगा बैठते है वो भी आगे बढ़ते है पर धीरे धीरे रुकते हुए,गिरते हुए, सँभलते हुए. इस बात से हमे यह नहीं समझ लेना चाइये की कोई भी गलत है. दोनों की अपनी अपनी तरीके है अपनी ज़िन्दगी जीने के. किसी को सफलता पसंद है तो किसी को सफलता के रस्ते पर आराम से चलना सफलता से ज्यादा पसंद है. हमे एक दूसरे की कदर करनी चाहिए.

हमे इस बात की कोशिश करनी चाइये की हम अपना दिल वहाँ लगाए जहाँ दिमाग बोले या फिर दिमाग वहाँ लगाए जिस तरफ दिल ले जाए. मुझे ऐसा लगता है की इस दोनों परिस्थितियों में हमारे सफलता के सम्भावना ज्यादा होती है. 

Monday, 29 February 2016

मुलाकात !!

पिछले कुछ महीनो से थोड़ी उथल पुथल चल रही है मेरी ज़िन्दगी में शायद, कोई है जो मेरे ज़ेहन में बस्ता जा रहा है, वैसे तो उसके साथ समय काटना मुझे रास आता है और दिन का एक हिस्सा उसके बारे में सोचते हुए ही निकल जाता है. जानता हूँ मैं की उसे पाना थोड़ा टेढ़ी खीर चखने के सामान है पर शायद मैं उसे पाना नहीं चाहता बस उसके साथ अपना वक़्त बाँटना चाहता और अगर मुझे वो मिल भी जाये और उसमे उसकी मर्ज़ी न हो तो फिर वो पाना ही क्या. हम दोनों के दरम्यान सब कुछ धीरे चल रहा पर शायद ठीक चल रहा है फिलहाल, हाँ मैं मानता हूँ की वो सभी पैमानों पर उत्तम तो नहीं है और आज के ज़माने में वैसा कोई होता भी नहीं है और अभी के हालातों को देख कर मैं कहता हूँ की किसी को वैसा होना भी नहीं चाहिए पर फिर भी वो मेरे लिए अज़ीज़ है, मेरे दिल के करीब है.
उनकी चश्मे की दूकान मुझे काफी पसंद पड़ती है और जिस तरह उस दूकान पर बैठी आँखे अपनी मासूम और शरारती नज़रे बेचती है वो एक अलग ही अंदाज़ मुझे प्रतीत होता है. अगर बात करे उनके ज़िद्द की तो उसे मापना खुद में ही एक कीर्तिमान होगी जिसका साहस कम से कम मुझमे तो नहीं है बल्कि मैं उनके इस ज़िद्दी स्वाभाव के साथ अनुकूल बनना चाहूंगा.
एक लम्बे  ही दिनों में उनके साथ मुझे एक मोहलत मिलने वाली है जब हम दोनों आमने सामने होंगे और कुछ बातें बिन कहे ही हो जाएंगी, वैसे तो मैं इस लम्हे का इंतज़ार कर रहा था पर जैसे जैसे वक्त नज़दीक आता जा रहा है वैसे वैसे ही दिल में डर और दिमाग में तनाव बढ़ता जा रहा है, उम्मीद है सब कुछ ठीक रहेगा.इस भेंट के पीछे न जाने कितने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लोगो का हाथ है जिन सबका मैं सुक्रिया अदा करना चाहूंगा.

Wednesday, 11 November 2015

इल्लुमिनेशन !!

मेरी आँखों में नींद के कतरे काम और ज़ुनून ज्यादा है शायद. ज़ुनून है बस उस 15 मिनट में अपनी ज़िन्दगी जीने का जिसकी कीमत शायद 15 दिन के नींदों से ज्यादा है.हाँ शायद मैंने नींद का सौदा किया है वो चीज़ के लिए जिसे दुनिया महसूस करना चाहती है, सामने से देखना चाहती है और शायद सबसे पहले भी देखना चाहती है.मैं बात कर रहा हूँ खड़गपुर के दिवाली की,जिसे हम इल्लुमिनेशन के नाम से जानते है.इल्लुमिनेशन दीयों का त्योहार है जिसमे हम केजीपिअन खड़ी चटाइयों पर दीयों से कोई आकृति बनाते है.कोई रामायण का एक पूरा काण्ड उन चटाइयों पर आंकित कर देता है तो कोई छोटे सी आकृति में ही एक काण्ड दर्शा देता है.
इसकी तैयारी शुरू होती है एक सोच से की हमें इस बार लोगों को किस तरह से आचम्भित करना है उन्हें चकित करना है.फिर उसके हिसाब से तार को घुमाकर लूप्स बनाये जाते है जिनकी संख्या हज़ारों  में होती है.चटाइयों पर पहले चौक से आकृति बना उसपर लूप्स बांधे जाते है.हम उन्हें आज से बचने के लिए चटाइयों पर मट्टी का लेप भी लगते है.
बात करें दिवाली के दिन की तो उस दिन एक साथ हज़ारों में दीये चटाइयों पर चढ़ाये जाते है और जब समय आने पर उन्हें एक साथ जलाया जाता है तो एक विहंगम दृश्य का आविष्कार होता है जिसे देखने कितने लोग बाहर से आते है अपने घर की दिवाली छोड़ कर बस हमारे उन 15 दिनों की मेहनत पर विश्वास कर उन्हें  15 मिनट तक देखने आते है. वही ख़ुशी और 15 मिनट जीने आते है जिसके लिए हमने अपनी नींदे उड़ा रखी थी.
दिल बाग़ बाग़ हो जाता है जब हम ये देखते है की जो हमने सपनो में देखा था वो चटाई पर उतर चुकी है बिलकुल उसी के समान उसी के रंग ढंग में.शायद मैं उस ख़ुशी को इस शब्दों के रंग से नहीं रंग सकता पर कुछ तो अनोखा होता है उस वक़्त जब लोग आपके काम की तारीफें कर रहे होते है उसका आनंद ले रहे होते है.अंत में हम इस समारोह का समापन अनगिनत रसगुल्ले खाकर करते है.
15 मिनट के बाद उन दीयो से सजी चटाइयों की कोई कीमत नहीं रह जाएगी.कल कोई झाड़ू लेकर  आएगा और उन मिटटी से बने दियो को फिर से मिटटी में मिला देगा.15 दिनों से हम जिसपर काम कर रहे थे वो हमे 15 मिनट का आनंद देकर 15 मिनट में उस चटाई का साथ छोड़ देगी.बुरा तो लगता पर शायद उस दीये का अस्तित्व ही मिटटी में मिलने के लिए होता है.अंत में मैं हम सबको मिटटी के दिए से ही तुलना करते हुए कहना चाहूंगा की हम भी मिटटी के बने है अगर हम सिर्फ दीये की तरह दूसरों के जीवन में थोड़ा सा उजियारा फैला कर मिटटी में मिल जाये तो हमारा जीवन सफल माना जायेगा.



Friday, 21 August 2015

69th स्वतंत्रता दिवस एक CRY Volunteer की नज़र से..

स्वतंत्रता दिवस, हमारे कैंपस में लोग इसका इस्तेमाल काफी सोच समझ कर करते है.कुछ नींद के बेचैन कतरों को पलकों के किनारों पर विश्राम देते है तो कोई पढाई पूजा में दिन व्यतीत करता है, कुछ ऐसे ही लैपटॉप्स,फ़ोन पर पूरा दिन ज़ाया कर देते है तो कुछ थोड़े-बहुत बचे-खुचे स्वतंत्र महसूस करने झंडोत्तोलन में सम्मिलित, सरीख होने पहुंच जाते है.
पर कुछ ऐसे लोग भी होते है कैंपस में,जो सुबह उठकर स्नानादि कर के कुछ ३०-४० बच्चों का दिन बनाने निकल पड़ते है.वो है आई आई टी खड़गपुर के कराई सदस्य.अभी सूर्य की किरणें फलक पर गिर ही रही थी की हम कुछ लोग अराशिनी प्राथमिक विद्यालय के परिसर में कदम रख देते है.हमारा उद्देश्य था इस स्वतंत्रता दिवस को इनके लिए यादगार बनाना साथ ही साथ इन्हें कुछ सीखा के जाना और इनके चेहरे पर हँसी फेरना.शुरू में हमने उनके साथ स्वतंत्रता दिवस का उत्सव मनाया-झण्डोतोल्लंन किया, उनकी कविताएँ सुनी, भाषण सुना और तिरंगे को पुष्पांजलि अर्पित की.फिर बच्चों को "कोलाज" सिखाया और फिर हमारे सदस्यों के मदद से उन्होंने खुद से अपना कोलाज बनाया.किसी ने कमल तो किसी ने झंडा, किसी ने घर तो किसी ने नाव बनाया.फिर उसमें कागज़ के छोटे छोटे टुकड़ों को सहेज सहेज कर उसपर चिपकाया और एक सुन्दर सी और अनोखी आकृति बनाया.जो आशा के विपरीत था, की वो इतना सही बना पाएंगे सिर्फ एक बार के प्रयास में.हमने सिर्फ बातों से ही उनका अभिनन्दन नहीं किया बल्कि उन्हें पुरस्कार से भी सम्मानित किया साथ ही साथ सभी को चॉकलेट्स भी दिए ताकि कोई खुद को किसी से काम न समझे.एक पल तो ऐसा आया जब मुझे लगा की मेरा दिन सफल हो गया, एक बच्चा आकर मेरा हाथ पकड़ कर मुझे धन्यवाद करता है की मैंने उसके लिए इतना सब कुछ किया, उस नादान को क्या पता की उसकी ख़ुशी में ही हमारी ख़ुशी भी बसी हुई है.
अंत में सभी शिक्षकों ने हमे मिड-डे-मील के लिए आमंत्रित किया और खिचड़ी चोखे के साथ साथ आइस क्रीम भी थाली में पेश किया.हमने काफी चाव से खाने का आनंद लिया फिर बच्चों को फिर से आने का वादा कर के उनसे अलविदा लिया. 

Wednesday, 19 August 2015

अतीत !!

एक साल हो गया पर ऐसा लगता है जैसे कल की ही बात हो, हम खेलते कूदते, एक दूसरे को तंग करते रहते थे, मज़ाक उड़ाते रहते थे, छेड़ा करते थे, शबाशिया भी देते थे, एक दूसरे को समझते थे और बहुत प्यार करते थे. हाँ कुछ परेशानियाँ भी आई, कुछ को हमने मिलकर हराया, तो कुछ को हमने अकेले ही मिटा दिया.उस को तो कभी नहीं भूल सकते जिसने हमारा बीच के रिश्ते का अस्तित्व ही मिटा दिया.अब मुझे पता नहीं की किसकी गलती थी उसमे, मैंने उस परेशानी को छोटा समझा या तुमने विश्वास गवां दिया की मुझसे वो परेशानी हार मनेगी या नहीं. बहरहाल मैं बताना चाहूंगा की मैं अत्यधिक खुश हूँ की हम मिले, साथ में हसे, घूमे, खाए, और सबसे ज्यादा इस बात का तुम्हारा साथ मिला मुझे, जिसे मैं अंतिम साँस तक अपने दिलों और ज़हन में रखूँगा. आज भी कभी कभी कुछ देख कर चाहे वास्तविकता में या फिर फिल्मों में  या कही और जब मैं अपने दिनों को याद करता हूँ तो पता नहीं क्यों मेरे चेहरे पर एक चमक आ जाती है और होंठो पर मुस्कान, वही छोटी वाली मुस्कान, जिसकी वजह से मैं काफी चर्चा में रहता था.
गम है तो इस बात का तुम्हारी कोई खबर नहीं, वैसे अब मैं जान कर भी क्या करूँगा, शायद मैं उसका हक़दार नहीं.दिल चाहता है की तुम्हारी खोज खबर लूँ कही से, पर अपने लब्ज़ों से जो तुमपर मैंने प्राणबाण चलाये थे वो याद आ जाते है. हो सकता है वो अपना फ़र्ज़ निभा रहे हो, उस वजह के लिए, जिसके लिए मैंने वो बाण तुमपर दागे थे.
खैर, अब जो हुआ उसे मैं और तुम बदल तो नहीं सकते है.इतना जरूर दिल पर हाथ रखकर कह सकता हूँ की हम दोनों इस एक साल में बदल तो चुके ही होंगे, अपनी गलतियों से कुछ सीखे होंगे,उन्हें आगे जीवन में उपयोग में लाएंगे और पहले से बेहतर इंसान भी बन चुके होंगे .तुम्हारे लिए तो कल भी भला सोचता था और आज कल से भी ज्यादा.अंत में इतना जरूर कहूँगा की अपने चेहरे की हँसी बनाये रखने और दिल में दीप जलाये रखना. 

Saturday, 15 August 2015

एक नज़र !!

बादलों को पर्वतों पर,
टूटते देखा है मैंने
सूरज को आसमान में,
डूबते देखा है मैंने
पंछियों को हवाओं में,
तैरते देखा है मैंने
गर्मियों में फतिंगों को,
जलते देखा है मैंने
रौशनी को पत्तों पर,
बिखरते देखा है मैंने
दोस्तों को वक़्त पर,
रंग बदलते देखा है मैंने
माँ को सबसे छुपकर,
रोते भी देखा है मैंने
बहना को चैन की नींद,
सोते देखा है मैंने
बच्चों को दूसरों से छिपकर,
पढ़ते देखा है मैंने
सच बोलने वालों को भी,
नज़रे चुराते देखा है मैंने... 

Saturday, 18 April 2015

पुराने पल..

कभी कभी मुझे वो ख़ास लम्हें बहुत ज्यादा याद आते है जिन्हे मैंने किसी विशेष व्यक्तियों के साथ ज़ाया किया था.उनकी बातें,उनके अंदाज़ और तौर तरीके जिस पर हम घंटों अपनी दलीलों के पेंच लड़ाते रहते थे.उनकी ख़ुशी और उनकी हर एक छोटी छोटी खुशियों का हिसाब रखते थे.क्युकी वो आज मेरे सफर में मेरे साथ नहीं है तो इस बात का एक हद तक अफ़सोस है पर  इस बात का थोड़ा गुरुर भी है कि शायद मुकद्दर को यही पसंद था जिसने मुझे इस काबिल बनाया कि मैं उन्हें आगे भी इसी तरह मुस्कुराते हुए झेल सकूँ.मुझे दुःख इस बात का कदापि नहीं है कि वो चले गए अपितु इस बात का होता है कि शायद वो अगर आज मेरी सफर में मेरे साथ होते तो ज़िन्दगी जीने का मज़ा कुछ और ही होता.खैर अब ज़िन्दगी तो हमारे हिसाब से नहीं चलने वाली बल्कि हमे ही उसके हिसाब से चलना पड़ेगा इस उम्मीद के साथ कि जो होता है वो किसी न किसी कारण से होता है और अच्छा ही होता है. 

Saturday, 28 February 2015

दोस्ती:एक एटीएम (ऐनी टाइम मदद )

ऐसा क्यों होता है की हम लोगों की अच्छाइयों को छोड़ उनके बुराइयों पर ज्यादा गौर कर बैठते है जब हमारी बारी आती है उनके लिए कुछ करने की.हम अगर किसी की निस्वार्थ भाव से मदद करें और कभी कभार किसी कारण के वजह से उसकी मदद न कर पाये तो उसे सिर्फ वही बात क्यों याद रह जाती है उसे वो तो बिलकुल याद नहीं रहता की हमने पहले भी उसकी मदद की है वो भी बिना किसी शर्त के बिना किसी लाभ के.हमने ही हर बार उसकी मदद करने की जिम्मेदारी थोड़ी न ले रखी है.जब उसके बारी आती है हमारी मदद की तो वो वही बात बोलकर निकल जाता है की " याद है तुमने उस दिन मेरी मदद नहीं की थी तो मैं क्यों करू " जैसे की वह बस उस मौके की तलाश में है की कब हम उनसे वैसा ही मदद मांगे.
कितनी चालू है ये दुनिया जो हमसे अपने काम बड़ी चालाकी से निकलवा लेती है या फिर हम बेवक़ूफ़ है जो बेवज़ह दुसरो की मदद के लिए अपना अमूल्य वक़्त ज़ाया करते फिरते है.मैं मानता हूँ कि किसी और से उम्मीद रखना खुद में अच्छी बात नहीं पर फिर भी कभी न कभी किसी मोड़ पर हमें दूसरों की,अपने दोस्तों की,जरूरत पद ही जाती हैं.
कुछ दोस्त तो ऐसे भी बन गए है जो सिर्फ काम पड़ने पर ही फ़ोन किया करते है. क्या आज का ज़माना वो ज़माना नहीं रह गया जहाँ लोग दूसरों की सलामती और हाल चाल जानने के लिए भी फ़ोन किया करें,लोगों को मतलब है तो बस अपने काम से. काम निकल गया तो कोई शुक्रिया तक नहीं कहता.और अगर कोई ये कहे की उसके पास समय नहीं था किसी को फ़ोन करने का तो आप उस व्यक्ति के संचालन का अंदाजा लगा सकते है,ये सोच सकते है की वो कैसे मैनेज करता होगा अपनी ज़िंदगी.
कुछ ऐसे भी दोस्त है जो ये बात गर्व से कहते है की हमारे तरफ तो लोग काम होने की वज़ह से दूसरों को फ़ोन करते है.दुःख की बात तो ये है की हम इतने शिक्षित होने के बावजूद इन ख्यालों पर आँख मूँद कर विश्वास कर लेते है.डिग्रियाँ तो बस कागजो पर ली जाती है काश कोई लोगों के चरित्र की भी डिग्रियां बांट देता तो कितना अच्छा होता.कम से कम ये तो पता चल जाता की किससे दोस्ती करनी है और किससे नहीं.
खैर मैंने तो इस श्रेणी में आने वालों दोस्तों से परहेज़ करना शुरू कर दिया और आपसे भी निवेदन है कि आप भी करें क्युकी जब आप उनके ऐसे कठोर और निर्दयी टिपण्णियां सुंनेंगे तो कही न कही आपको भी दर्द जरूर होगा

Tuesday, 17 February 2015

स्प्रिंग फेस्ट'15

कॉलेज में बाहर के दोस्तों के साथ वक़्त बिताने का मौका बार बार नहीं मिलता.पर इस बार मुझे भी ऐसे ही कुछ मौका मिल गया था.मैं शुरू से सोचता था कि स्प्रिंग फेस्ट में होता क्या है लड़कियों को ताड़ने के अलावा पर ताड़ने का मज़ा और भी बढ़ जाता है जब आपके साथ आपके दोस्त हो.मेरे साथ भी इस बार ऐसा ही कुछ हुआ.बहार से मेरे कुछ दोस्त आये हुए थे.वो तो मेरे कमरे में ही ठहर रहे थे पर मुशीबत तब आई जब मुझे पता चला कि दोस्तों में एक अनजान लड़की भी है जिसके मैंने पहले काफी चर्चे तो सुने थे पर मिला नहीं था.बड़ी मुस्श्कत के बाद मैंने किसी तरह उसके यहाँ रुकने का इंतज़ाम करवाया.धन्यवाद हो प्रियंका का जिसने सही वक़्त पर मेरी मदद कर दी और मेरी लाज बचायी.वैसे उन्होंने सोचा तो बिलकुल भी नहीं होगा कि मैं साइकिल से मिलने पहुँचूँगा पर फिर भी अगर उन्हें थोड़ा अजीब लगा भी हो तो लगने दिया जाए आखिर कार वो खड़गपुर जो आये थे.
हमलोगों ने इंडियन ओसियन बैंड के कुछ गाने सुने और बीच में ही निकल गए.खाना खाने के बाद थोड़ा घूम ही रहे थे कि क्रिकेट वालों की मीटिंग का कॉल आ गया है.मीटिंग के बाद मैं उनसे फिर से मिला और कुछ बात चीत के बाद मैंने उन्हें आराम देने का फैसला लिया.रात को बातें करते करते कब २:३० बज गए पता ही नहीं चला.
अगले दिन पांच परमेश्वर के लिए सुबह ही निकलना था तो मैंने सरस्वती पूजा का प्रशाद खा कर निकलना उचित समझा.सारा दिन एरीना में पसीना बहाने के बाद जब शाम में फ़्लवोर्स में डांस किया तब जाकर दिन कि सारी थकान मिटी और वापस आ कर फिर से उन्हीं दोस्तों के साथ सुबह के ३ बजे तक बीच सड़क पर उनके साथ घूमना,गप्पे और हसी मज़ाक सब कुछ कीमती लग रहा था मेरे लिए.रजत कि तो मारते मारते मैं खुद भी थक गया था.बेचारा !! जब वो चले गए तो पता नहीं स्प्रिंग फेस्ट का अगला दिन काफी खली खली लग रहा था ऐसा मानो उस दिन साधारण क्लासेज चल रही हो.फिर बाद में मैं खुदको बहुत कोश रहा था कि मुझे उनको और वक़्त देना चाहिए था.शायद मैं समय का संतुलन बनाने में असफल हो गया था.पर जो भी हुआ अच्छा ही हुआ.आशा करता हूँ की वो दुबारा यहाँ आये .उस एक दिन में मैंने काफी लम्बी ज़िन्दगी जी.उस दिन तो वो एक दिन भी छोटा पड़ गया था.उम्मीद करता हूँ ज़िन्दगी आगे भी ऐसे हसीं और यादगार लम्हों से मुलाकात कराने की ज़ुर्रत करते रहेगी.

Friday, 9 January 2015

सपनों का शहर...मुंबई !

लोग कहते हैं की मुंबई सपनों का शहर है.यहाँ लोग अनेकों सपने लेकर आते हैं.कोई बॉलीवुड में अपनी किस्मत आज़माने आता है तो कोई अपने बच्चों का पेट पलने की उम्मीद लगाये,कोई अपना भविष्य सवारने आता है तो कोई पापा के कारोबार को आगे बढ़ने.सबके अपने अपने सपने होते हैं जिसे वो अपने तरीके से पूरा करना चाहते है.कुछ लोग सफल होते है तो कुछ नहीं और कुछ तो सपनों की इस मायानगरी के दिखावे का शिकार हो जाते हैं.

पर एक और वैसे लोग भी होते हैं जिनके सपनें बस सपनें ही रह जाते हैं.कभी वक़्त साथ नहीं देता तो कभी पैसे और अगर गलती से ये दोनों साथ भी दें जाए तो हालत साथ नहीं देता.कभी कभी तो अचानक वो कारण ही तबाह हो जाते है जिसे पूरा करने की सोच वो मुंबई जाने के सपनें संजोते है.उनके हौसले जिनमें पहले पंख लगे होते है धीरे धीरे उन्हीं पंखो में जंग लग जाती है और उनका सपना बस सपना ही रह जाता है मुंबई जाने का

Saturday, 8 November 2014

ज़िन्दगी रॉक्स ...!!!

ज़िन्दगी का खेल होता है ऐसे
बिन मौसम बरसात हो जैसे
पल भर में ये बदलती है ऐसे
धुप और छाए दिन में हो जैसे

कभी गम के आंसू टपकती है
तो कभी खुशियों की बारिश कर देती है
कभी निराशा की शाम करती है
तो कभी उम्मीदों की किरण बिखेरती है
कभी यारो से लडवा देती है
तो कभी नयी दोस्ती करवा देती है
कभी हम किसी का सहारा बनते है
तो कभी हमारे अपने ही छोर जाते है
कभी चीटियों के जैसे बिजी होते है
तो कभी मरीज के जैसे पड़े होते है
कभी कोई हमारा दिल तोड़ देता है
तो कभी कोई उसमे समां जाता है
कभी ज़िन्दगी रेगिस्तान की बंजर लगती है
तो कभी फूलो जैसे रंगीन हसी लगती है
कभी भगवन से रिश्ता तोडवा देती है
तो कभी उनसे जुड़ने को मजबूर कर देती है
कभी पापा की शान का कारण बनती है
तो कभी माँ के उदासी का राज बना देती है

पर कोई तो ज़िन्दगी के इस खेल में आएगा
मेरा हाथ थमेगा और कभी नहीं छोरेगा
मेरी हर बात सुनेगा मुझे समझेगा
वक़्त आने पर अपनी जान की बजी तक लगा देगा

वो मेरी अच्छाई की तारीफ़ भी करेगा
और बुरइयो पर मेरी वाट तक लगाएगा
कामयाबियो पर मेरी पार्टी भी लेगा
और हार पर जो जीतने को कहेगा

पर ज़िन्दगी को कोई समझ नहीं है पाया
और किस्मत ने मेहनत को हरा कब है पाया
फिर भी ये ज़िन्दगी तो ज़िन्दगी है
और इसे जीना तो हमें ही है ...

Saturday, 1 November 2014

dedicated to Vinay Prasad !! happy birthday yar !!

कुत्ता,कमीना और सनकी है तू
कमरे में न घुसने देता है तू
लाख पाबंदियां लगता है तू
पर फिर भी यारों का यार है तू
आवारा,आलसी और हरामी है तू
किसी का दर्द न समझता है तू
बस लेता और कुछ न देता है तू
पर रह दिखने में आगे है तू
अशिष्ट,अभद्र और स्वार्थी है तू
डेप का असली मग्गू है तू
प्रोफ को नचा देता है तू
पास दोस्तों का भला भी करता है तू
चोर,गुंडा और शिकारी है तू
किसी के प्यार में दीवाना है तू
रातों की नींदे चुराता है तू
दिलों जान भी उसपर छिड़कता है तू

Wednesday, 29 October 2014

उलझन !!

ज़िन्दगी बहुत अजीब है,कब क्या कर दे कुछ मालूम ही नहीं होता.हम किसी की पीछे भागते है और वो किसी और के पीछे.सोचता हूँ की भागना ही बंद कर दूँ.जो मिलना होगा मिल जायेगा पर फिर ज़िन्दगी कुछ ऐसा क्यों करती है जो हममे भागने पर मज़बूर कर देता है.किसी के पास समय नहीं होता तो किसी के पास इरादा.पर हकीकत ये है की अगर हम उन चीज़ों पर अपना ध्यान केंद्रित करें जो हमारे पास है और उन लोगों से तुलना करें जिनके पास कुछ भी नहीं है तो हम खुद तो ज्यादा खुशनसीब पाएंगे.सच में कभी कभी तो समझ में नहीं आता है की करना क्या है.बिलकुल ठंढे पड़ जाते है.मेरे हिसाब से हमे कुछ चीज़ों को वक़्त और ईश्वर पे छोड़ देना चाहिए और आगे बढ़ना चाहिए.मै भी अभी कुछ इसी तरह की परिस्थिति में हूँ मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है की ज़िन्दगी के इस खेल में क्या भूमिका निभाऊ,ज़िन्दगी के इस होली में रंगों से भींग जाऊ या फिर कही जाकर छुप जाऊ या फिर सिर्फ आगे बढू यह मान कर की जो होगा अच्छा ही होगा.वैसे तो मैंने अपने दोस्तों की भी सहायता ली पर सब कुछ व्यर्थ रहा.जैसा की मैंने पहले भी कहा है की ज़िन्दगी एक सागर के सामान है और हम एक नाव की भांति और इस लम्बे सफर में कुछ फैसले हमें ही करने होते है चाहे वो सही हो या गलत,पर फैसले हमें ही लेने होते है.क्या होगा ज्यादा से ज्यादा हम गिर जायेंगे हमें चोट लगेगी,पर मुझे विश्वास है ज़िन्दगी पर अगर ये एक द्वार बंद करेगी तो दूसरा भी ज़रूर खोलेगी.

Saturday, 25 October 2014

मेरे पड़ोसी !!

यहाँ तीन साल में मुझे तरह तरह के पड़ोसी मिले,कुछ ज्यादा ही मस्ती मज़ाक करते थे तो कुछ हाल चाल पूछने तक नहीं आते.पहले वर्ष में मेरे पड़ोसी ऐसे थे जिनकी कहानियां सुनते लोग लोट पोट हो जाएँ,वही दूसरे तरफ शौचालय होने के कारण दूसरे पड़ोसी का नसीब मुझे हासिल नहीं हुआ.दूसरे वर्ष एक और ठीक थक लोग थे जो समय समय पर काम से काम टाइम पास करने में मदद कर दिया करते थे और पहले वर्ष की ही तरह मेरे दूसरी तरफ सीनियर्स रहते थे जिन्हे हॉल से कोई मतलब नहीं था तो हमारा भी उसने कोई मतलब नहीं था,पर मेरे हिसाब से दूसरा पड़ोसी शौचालय ही ठीक था जिसे हम रोज़ कम से कम काम में तो लाया करते थे.
अब बात करते है वर्त्तमान की.ऐसा कहा जाता है की हम अपने दोस्त चुन सकते है पर पड़ोसी नहीं,पर मैंने अपने पड़ोसियों को चुना था और उनके लिए रूम तक झाप के रखा था,वो बात अलग है की बहुत कोशिशों के बाद उससे पार्टी निकलवाने में मैं सफल रहा.खुद के डिपार्टमेंट का बन्दा होने,पढाई में अव्वल और अच्छी दोस्ती होने के कारण मैंने उसे रूम तो दिलाने में मदद कर दी पर अभी के हालात कुछ अलग ही है.अभी ऐसा हो चूका है की वो रूम से न तो बाहर आता है और न ही किसी को रूम में घुसने देता.अगर कोई गलती से अंदर आ भी गया तो उसके हज़ार नखरे.इधर मत बैठो,इसे मत छुओ,ये मत करो-वो मत करो.लोग कितने स्वार्थी हो जाते है कभी कभी,पर स्वार्थी होना भी अच्छा है,जरूरत है तो एक सीमा की.
अब बात करते है दूसरे पड़ोसी की,हालाँकि उसे भी मैंने ही चुना था अपने पड़ोसी के रूप में.पर उसकी दुल्हन तो कोई और निकली.उसकी दुल्हन मगाई है.सिंगल रूम का सही इस्तेमाल तो सही मायने में वही कर रहा.दिन भर रूम में बंद और लैपटॉप में  उलझा रहता पढ़ने के लिए और खाली वक़्त में अंग्रेजी गाने उसका मन बहलाने का काम करते है.कभी कभी तो दिनों तक मैं उसका चेहरा भी नहीं देख पाता.
कभी कभी लगता है की मैंने खुद अपने हाथों से ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है,पता नहीं अगर मुझे कुछ हुआ तो वो रूम से बहार भी निकलेंगे या नहीं.पर जो भी हो वो दिल से अच्छे है.मेरी कठिनाइयों में मेरे साथ रहेंगे ऐसा मैं उम्मीद करता हूँ,पर कभी कभी उम्मीदें ही इंसान को डूबा जाती है.

Saturday, 18 October 2014

नाव और ज़िन्दगी !!

ज़िन्दगी एक सरिता की तरह है और हम उसमे तैरने वाले नाव.मुझे हमारा जीवन चक्र इस नौका के सफर के सामान प्रतीत होता है.जिस तरह एक नाव अकेला अपना सफर तय करता है उसी की भांति हम भी अपना जीवन काल अकेले ही व्यतीत करते है.हमारा न कोई होता है और न हम किसी के.दो पल के लिए अगर कोई साथ भी आता है तो एक ओर जहाँ उसके आने का ख़ुशी ओर उमंग होता है वहीँ किसी दिल के कोने में उसके बिछड़ने का डर भी.दोस्त प्यार माँ बाप सब उस नाव के सफर में रंग भरने के लिए प्रकट होते है अपनी भूमिका निभाते है ओर समय आने पर विलुप्त हो जाते है.इस नौके का सफर कोई आसान नहीं होता,शायद हमारे ज़िन्दगी से कम तो कदापि नहीं.इसे भी अपने सफर में कई सारे तूफानों का सामना करना पड़ता है,कभी हवाएँ साथ नहीं देती तो कभी वायु अपना रुख बदल लेती,पर फिर भी ये नाव अपने मुकाम तक पहुचने में सफल हो ही जाती.  
हमें भी इससे प्रेरणा लेकर आगे बढ़ना होगा.छोटे मोटे बरसात में भीगने से न डरकर उसका मुकाबला करना होगा उसका लुफ्त उठाना पड़ेगा.एक बात और कभी कभी वक़्त सागर की तरह सुनसान और शांत होगा और हम उसमे अकेले खड़े होंगे,वो हमें काटने को भी दौड़ेगा पर हमें उसे शांति से ग्रहण करना होगा,उसे समझना होगा.तभी इस सफर का मज़ा हम ले पाएंगे,इस विशाल रुपी सागर में जीवन गुजार पाएंगे. 

Wednesday, 8 October 2014

पवन का एक झोका !!

तुम अगर जो नदी हो तो मैं भी पवन का एक झोका हूँ ,जो जाने अनजाने में तुम्हारे साथ रहता है या रहेगा,हर पल हर दम चाहे तुम मुझे महसूस करो या नहीं पर मैं हूँ तुम्हारे पास,तुम्हारे साथ हूँ.
तुम जब हिलोरें लेती हो तो वो मैं ही होता हूँ जो तुम्हे सफल बनता हूँ करता,तुम्हे आगे भेजता हूँ. तुम्हारे अंदर जो जीव जंतु और भिन्न भिन्न प्रकार के पोधें पनप रहें है,जो साँस ले रहे है उनका कारण भी मैं हूँ,मैं तुममे ही समाया हुआ हूँ,तुम मानो या न मानो,पर मैं हूँ तुम्हारे पास तुम्हारे साथ.
ज़रा सोचो खुद को मुझसे अलग कर के,क्या तुममे जीवन रहेगा?क्या तुम मुझसे टूट कर रह सकोगी,यहाँ तक की हम दोनों एक दूसरे के बिना कुछ नहीं हैं,तुम खुद से अगर ऑक्सीजन निकल दो तो बस मेरे ही दो रूप रह जाते हैं.
मैं यह चाह कर भी मना नहीं कर सकता की तुम मुझमे समायी न हो
मैं तो एक अभिश्राप ही हूँ,मैं किसी को न तो दिख सकता हूँ न तो कोई मुझे छु सकता है जो कम से कम तुम्हारे साथ तो नहीं है.वो तो एक तुम ही हो जो मुझे जीने का वरदान देती है.तुम ही देखो न अगर जो तुम मुझमे न हो तो मैं क्या हूँ,गरम हवा जिसे लोग लू कहकर कलंकित करते है.मैं क्या करूँ,इसमें मेरी कोई गलती नहीं है,तुम ही मुझसे रूठ कर चली जाती हो,मुझे अकेला छोड़ देती हो.
पर गर जो वहीँ तुम मेरे साथ होती हो तो मैं ठंढे पवन का झोंका बन जाता हूँ जिसे लोग खूब प्यार करते है और स्वीकारते हैं और जब तुम मुझे अपने गले लगा लेती हो,जब ज्यादा ही प्यार कर बैठती हो तब तो लोग झूम उठते है और वो ऐसा क्यों न करे उन्हें बारिश की फुहारें जो मिल रही होती है.
इसलिए अंततः तुम मेरे साथ रहना,मुझे समझना,मेरी खामियों को स्वीकारना और मेरी अच्छाइयों को और अच्छा करने का प्रयास करना.हम दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे है,मैं आधा तुम्हारे बिना और तुम आधी मेरी बिना.

Monday, 22 September 2014

तुम !!

तुम एक नदी की तरह हो जो न कभी रुकने का नाम लेती है,न कभी थमने का,बस मीलों दूर बहना चाहती है.रास्ते में चाहे कितना विशाल पर्वत ही क्यों न आ जाये तुम बाज़ नहीं आती,उसे भी चीर कर अपने रास्ता बना लेती हो.राह में न जाने कितनों को अपने प्यार से भिगोई अमृत पिलाती हो,उनकी प्यास बुझती हो.कभी किसी की मदद करने से नहीं कतराती,यहाँ तक की भूले पथिक को भी खुद मद्धम होकर रास्ता पार कराती.लोग तुम्हें चाहे कितनी भी पीड़ा दे दे,तुम्हें चाहे कितना भी विषाक्त क्यों न कर दे,तुम अपना रंग नहीं बदलती,हँसकर  इठलाती हुई बस उस दर्द को खुद में समेट लेती हो.
पर तुम्हारा दर्द कौन समझेगा..शायद सागर जो तुम्हें खुद में विलीन करने के इंतज़ार में कब से शांत बैठा हुआ है.तुम्हारा हर दर्द.तुम्हारा हर घाव भरने के लिए आतुर है,सारे रंग रंगीले फूलों को तुमसे मिलवाने के लिए सपने सजा रखे है.उसे इंतज़ार है तो बस तुम्हारा..
तुम बस बहती रहना,बिना किसी चिंता के,क्युकी कोई है जो तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है,तुमसे मिलने के लिए,तुम्हें खुद के रंग में रंगने के लिए,तुम्हें प्यार करने के लिए,तुम्हें खुद से जोड़ने के लिए.बस तुम थकना नहीं,खुद पर विश्वास रखना और बहती चली जाना..बस बहती चली जाना...

Wednesday, 17 September 2014

Quotes within my Life :)


  • no Gains without Pains
  • No hurting to anyone! Everyone is child of God and it's like hurting God !!
  • true love lasts long !there's no arrogance,no self respect and no ego.it's about how much value they give to each other,it's just two people loving each other endlessly.
  • there's always a reason behind every thing Which happens in our life! Don't find the reason But start accepting that thing.
  • Work is worshp.